पहाड़ों की शांत वादियों में बसे ऊखीमठ में सोमवार को माहौल काफी गरमाया रहा। जहाँ आमतौर पर केवल केदारनाथ यात्रा की चर्चा होती है, वहां इस बार मजदूरों के हक और रोजी-रोटी की आवाज गूंजी। तहसील परिसर का कोना-कोना केंद्र सरकार के खिलाफ नारों से गूंज उठा।
मामला मनरेगा (MGNREGA) को समाप्त कर उसकी जगह नया ‘विकसित भारत-जी राम जी’ (VB-GRAMG) विधेयक 2025 लाने का है। रुद्रप्रयाग जनपद की भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) इकाई ने इस बदलाव को ग्रामीण मजदूरों के पेट पर लात मारना करार दिया है।
ऊखीमठ में क्या हुआ? (Breaking Ground at Ukhimath)
सोमवार की दोपहर, जब ऊखीमठ की ठंडी हवाओं के बीच माकपा कार्यकर्ता तहसील परिसर पहुंचे, तो उनके हाथों में नए बिल की प्रतियां थीं। पार्टी जिला मंत्री वीरेंद्र गोस्वामी के नेतृत्व में प्रदर्शनकारियों ने न केवल धरना दिया, बल्कि विरोध स्वरूप बिल की प्रतियां भी जलाईं।
प्रदर्शनकारियों का गुस्सा इस बात पर था कि सरकार ने चुपचाप उस कानून का स्वरूप बदल दिया है जिसे मजदूरों ने लंबे संघर्ष के बाद हासिल किया था।
विरोध के मुख्य कारण: क्यों जल रही हैं बिल की प्रतियां?
ग्रामीणों और मजदूरों के बीच यह डर है कि नया विधेयक केवल “नाम बदलने” का खेल नहीं है, बल्कि यह उनकी सुरक्षा को कमजोर करेगा।
- अधिकार बनाम दया: माकपा का आरोप है कि मनरेगा एक ‘मांग आधारित’ (Demand-driven) अधिकार था। नए बिल में इसे बजट और सरकारी कोटे के अधीन किया जा रहा है।
- 60:40 का बोझ: नए बिल में केंद्र सरकार ने राज्यों पर वित्तीय बोझ बढ़ा दिया है। बड़े राज्यों के लिए केंद्र की हिस्सेदारी 100% से घटाकर 60% कर दी गई है, जिससे उत्तराखंड जैसे राज्यों पर दबाव बढ़ेगा।
- नो-वर्क पीरियड: विधेयक में पीक खेती के मौसम में 60 दिन तक काम रोकने का प्रावधान है, जिसे माकपा मजदूरों के रोजगार छीनने का बहाना मान रही है।
गांव वालों पर क्या होगा असर?
ऊखीमठ और आसपास के गांवों जैसे गुप्तकाशी, कालीमठ और फाटा के मजदूर पूरी तरह मनरेगा पर निर्भर हैं। यदि यह योजना बजट-सीमित हो गई, तो काम मांगने पर “फंड खत्म हो गया” जैसा बहाना आम हो जाएगा।